भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में 108 को पूर्णता का प्रतीक माना गया है। जप-माला का प्रत्येक मनका ध्यान को एक लय देता है और मन भटके तो उसे नाम की ओर वापस लाता है।
108 पूरा करना अनिवार्य प्रतियोगिता नहीं है। पाँच शांत जप भी यांत्रिक 108 जप से अधिक अर्थपूर्ण हो सकते हैं। संख्या को सहारा बनाएं, दबाव नहीं।