गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। भगवान गणेश बुद्धि, समृद्धि, शुभ आरंभ और विघ्नों को दूर करने वाले देवता (विघ्नहर्ता) हैं।
पौराणिक कारण
हिंदू पुराणों (मुख्य रूप से शिव पुराण) के अनुसार:
- माता पार्वती ने स्नान करने से पहले अपने शरीर के हल्दी-चंदन के उबटन से एक बालक की रचना की और उसे जीवन दिया। उन्होंने बालक को द्वार की रक्षा करने को कहा ताकि कोई उन्हें परेशान न करे।
- जब भगवान शिव घर लौटे, तो बालक (जो उन्हें नहीं जानता था) ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। क्रोधित होकर शिव ने बालक का सिर काट दिया।
- जब पार्वती ने यह देखा तो वे बहुत दुखी हुईं। उन्हें सांत्वना देने के लिए शिव ने अपने गणों को उत्तर दिशा की ओर मुंह किए हुए पहले जीव का सिर लाने का आदेश दिया। वह एक हाथी का सिर था। शिव ने उस हाथी का सिर बालक के शरीर पर लगाकर उसे पुनर्जीवित कर दिया।
- फिर शिव ने घोषणा की कि यह बालक गणेश (या गणपति) कहलाएगा और सभी पूजा-पाठ में सबसे पहले पूजा जाएगा तथा भक्तों के रास्ते के विघ्न दूर करेगा।
माना जाता है कि यह घटना भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुई थी। इसलिए इस दिन को गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी कहा जाता है।
आध्यात्मिक महत्व
- भगवान गणेश बुद्धि, ज्ञान और सफलता के देवता हैं।
- किसी भी नए कार्य, परीक्षा, व्यापार, विवाह या महत्वपूर्ण शुरुआत से पहले उन्हें पूजा जाता है।
- उनकी पूजा से विघ्न दूर होते हैं और सुख, समृद्धि व सौभाग्य मिलता है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारण
- यह पर्व प्राचीन काल से घरों में मनाया जाता रहा है।
- मराठा काल में छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसे सार्वजनिक रूप से मनाने को प्रोत्साहित किया।
• 1893 में स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसे महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक उत्सव (सार्वजनिक गणेशोत्सव) का रूप दिया।
उस समय अंग्रेजों ने राजनीतिक सभाओं पर रोक लगा रखी थी। तिलक ने इस पर्व के माध्यम से सभी जातियों और समुदायों के लोगों को एकजुट किया, एकता की भावना बढ़ाई और राष्ट्रवाद जगाने का काम किया।
आज यह पर्व 1.5 से 11 दिनों तक (अक्सर 10 दिन) मनाया जाता है और अंत में गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। यह प्रतीक है कि गणेश जी भक्तों को आशीर्वाद देकर अपने धाम लौट जाते हैं।
संक्षेप में:
गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्म का उत्सव है। इसमें हम उनसे बुद्धि और विघ्नहर होने का आशीर्वाद मांगते हैं। ऐतिहासिक रूप से यह पर्व सामाजिक एकता और राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने का माध्यम भी बना।

