नित्य पूजा विधि
घर के लिए सरल नित्य-पूजन क्रम — शुद्धि, संकल्प, अर्पण, जप, आरती और क्षमा-प्रार्थना।

Before you begin
पूजा सामग्री
पहले आवश्यक सामग्री तैयार कर लें, फिर नीचे दी गई पूजा विधि के अनुसार पूजा आरम्भ करें।
Samagri checklist
Step-by-step
पूजा विधि
लगभग 10–18 मिनट
Step 1
तैयारी और बाह्य शुद्धि
स्नान या हाथ-मुख धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा-स्थान को साफ करें, सामग्री व्यवस्थित रखें और फोन को कुछ समय के लिए मौन कर दें।
पूजा का आरम्भ व्यवस्था से होता है; जल्दबाज़ी से नहीं।
Step 2
आसन, दीप और मन की शुद्धि
पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। दीप प्रज्वलित करें, तीन सहज श्वास लें और मन को इष्ट के चरणों में स्थिर करें।
Step 3
आचमन और संकल्प का भाव
जल को पवित्रता का प्रतीक मानकर आचमन का भाव करें। अपना नाम, आज का दिन और पूजा का सरल उद्देश्य मन में कहें — शांति, कृतज्ञता और ईश्वर-स्मरण।
विस्तृत वैदिक संकल्प न आता हो तो स्पष्ट, सत्य और छोटा संकल्प पर्याप्त है।
Step 4
गणेश, गुरु और कुल-परंपरा स्मरण
‘ॐ गं गणपतये नमः’ कहकर विघ्नहर्ता का स्मरण करें। फिर गुरु, माता-पिता और अपनी कुल-परंपरा को कृतज्ञता से प्रणाम करें।
Step 5
ध्यान और आवाहन
इष्टदेव के स्वरूप, गुण या नाम का ध्यान करें। पुष्प या अक्षत अर्पित करते हुए निवेदन करें — ‘हे प्रभो, मेरे हृदय और इस पूजन में विराजिए।’
Step 6
जल, गन्ध, अक्षत और पुष्प
क्रम से जल, चन्दन/रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित करें। प्रत्येक अर्पण के साथ इष्ट का नाम लें। मूर्ति की सामग्री और परंपरा के अनुसार ही प्रत्यक्ष स्नान कराएँ।
Step 7
धूप, दीप और नैवेद्य
धूप और दीप दिखाएँ। सात्त्विक नैवेद्य तथा जल अर्पित करें। कुछ क्षण मौन रहकर भोजन और जीवन के लिए कृतज्ञता व्यक्त करें।
Step 8
नाम-जप, स्तोत्र या पाठ
समय के अनुसार 11 या 108 नाम-जप करें, अथवा चुनी हुई आरती, चालीसा या स्तोत्र पढ़ें। कम पाठ भी एकाग्रता से किया जाए तो साधना सार्थक रहती है।
Step 9
आरती और प्रदक्षिणा-भाव
आरती गाएँ या शांत भाव से पढ़ें। सुरक्षित स्थान पर दीप घुमाएँ। वहीं बैठे-बैठे हाथ जोड़कर प्रदक्षिणा का भाव भी किया जा सकता है।
Step 10
क्षमा-प्रार्थना और समापन
ज्ञात-अज्ञात त्रुटियों के लिए क्षमा माँगें। सबके कल्याण की प्रार्थना करें, प्रणाम करें और प्रसाद सम्मान से बाँटें।
दीपक को सुरक्षित रूप से जलने दें; उसे बिना देखरेख न छोड़ें।
समापन
पूजा के बाद कुछ क्षण मौन बैठें। प्रसाद ग्रहण करें और दिन के एक कर्म को सेवा या दया से जोड़ें।
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