यदि आप मानते हैं कि भगवान कण-कण में हैं, तो क्या मंदिर उस कण-कण से बाहर है? क्या मंदिर में रखी मूर्ति में भगवान नहीं हैं?
यदि भगवान सर्वत्र हैं, तो वे मंदिर में भी हैं और प्रत्येक जीव के भीतर भी हैं।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या आपको वास्तव में हर कण में भगवान का अनुभव हो रहा है?
अभी हमारी दृष्टि इतनी विकसित नहीं हुई है कि हम हर वस्तु और हर जीव में परमात्मा के दर्शन कर सकें।
इसीलिए हम श्रद्धा, विश्वास और मान्यता का सहारा लेते हैं। जैसे गणित में किसी कठिन प्रश्न को हल करने के लिए पहले कुछ मानकर चलते हैं, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में भी हम भगवान के किसी एक स्वरूप को स्वीकार करके अपनी साधना शुरू करते हैं।
मंदिर में भगवान के स्वरूप का दर्शन, नाम-जप, पूजा और भक्ति करते-करते हमारा मन शुद्ध होता है। धीरे-धीरे वही श्रद्धा इतनी व्यापक हो जाती है कि हमें भगवान केवल मंदिर में नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि में दिखाई देने लगते हैं।
इसलिए मंदिर जाना इस बात का प्रमाण नहीं कि भगवान केवल मंदिर में हैं, बल्कि यह उस साधना का आरंभ है जिसके द्वारा हम हर जगह भगवान की उपस्थिति का अनुभव करना सीखते हैं।

